LAW'S VERDICT

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में बाघों की मौतें सामान्य नहीं लग रहीं: हाईकोर्ट



जबलपुर।  ‘इतनी संख्या में टाइगर्स की मौतें सामान्य घटना नहीं हो सकती’
  यही तल्ख टिप्पणी मप्र हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीज़न बेंच ने बुधवार को की है। दरअसल, डिवीज़न बेंच उस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व में वर्ष 2025 में 54 और वर्ष 2026 में हुई 9 बाघों की मौत पर सवाल उठाये गए हैं। बेंच ने इन सभी बाघों के मौत पर बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व के फील्ड डायरेक्टर को जवाब देने कहा है। मामले की अगली सुनवाई 25 फरवरी को होगी।

इन बिंदुओं पर मांगा जवाब

जबलपुर में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस संजिव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने साफ कहा कि यदि सुरक्षा व्यवस्था प्रभावी होती तो इतनी बड़ी संख्या में मौतें नहीं होतीं। कोर्ट ने बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर को निर्देश दिया है कि वे प्रत्येक मृत बाघ के बारे में मौत का कारण, जांच की वर्तमान स्थिति और अब तक उठाए गए क़दमों का विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत करें।

आंकड़े हैं चौंकाने वाले 

भोपाल के वाइल्डलाइफ एक्टिविस्ट अजय दुबे की जनहित याचिका में दावा किया गया है कि वर्ष 2025 में जनवरी से 19 दिसंबर के बीच 54 बाघों की मौत दर्ज हुई। वर्ष 2026 के जनवरी महीने में ही 9 बाघों की मौत हो चुकी है। 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत के बाद यह किसी एक वर्ष का सबसे बड़ा आंकड़ा बताया जा रहा है।

ताजा गणना के अनुसार विश्व में कुल 5,421 बाघ हैं। भारत में 3,167 और मध्यप्रदेश में 785 बाघ हैं। इतनी बड़ी आबादी वाले राज्य में लगातार मौतें संरक्षण तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।

‘हर बार आपसी संघर्ष बताकर पल्ला झाड़ा जाता है’

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी और अधिवक्ता अलका सिंह ने दलील दी कि रिजर्व क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अवैध शिकार (पोचिंग) की आशंका है। बिजली का करंट लगाकर और अन्य अवैध तरीकों से बाघों को मारा जाता है। बावजूद इसके वन विभाग अधिकांश मामलों को “आपसी संघर्ष” बताकर असली कारणों से ध्यान भटका देता है।

हाईकोर्ट की सख्ती से बढ़ी जवाबदेही

हाईकोर्ट ने 20 जनवरी को ही अनावेदकों को नोटिस जारी कर दिए थे। अब फील्ड डायरेक्टर को विस्तृत रिपोर्ट के साथ पेश होना होगा। अगर जांच में लापरवाही या अवैध शिकार की पुष्टि होती है, तो यह मामला सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि वन्यजीव संरक्षण की बड़ी विफलता साबित हो सकता है।  बांधवगढ़, जो देश-विदेश में टाइगर डेंसिटी के लिए मशहूर है, वहां इस तरह की घटनाएं संरक्षण मॉडल पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा रही हैं। अब सभी की नजरें 25 फरवरी की सुनवाई पर टिकी है। क्या फील्ड डायरेक्टर का जवाब संतोषजनक होगा या कोर्ट और सख्त रुख अपनाएगा?

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